भागवत महापुराण तृतीय स्कंध अध्याय 2 उद्धव जी द्वारा भगवान की बाल लीलाओं का वर्णन की कथा सुनिए

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #तृतीय #स्कंध #अध्याय 2 #उद्धव जी द्वारा #भगवान की #बाल #लीलाओं का #वर्णन की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep Pandey 9871030464 https://youtu.be/wNa58BjNlW0
#श्रीशुकदेव जी कहते हैं- जब #विदुर जी ने परम भक्त #उद्धव से इस प्रकार उनके प्रियतम श्रीकृष्ण से सम्बन्ध रखने वाली बातें पूछीं, तब उन्हें अपने #स्वामी का स्मरण हो आया और वे हृदय भर आने के कारण कुछ भी उत्तर न दे सके। जब ये पाँच वर्ष के थे, तब बालकों की तरह खेल में ही #श्रीकृष्ण की मूर्ति बनाकर उसकी सेवा-पूजा में ऐसे तन्मय हो जाते थे कि कलेवे के लिये #माता के बुलाने पर भी उसे छोड़कर नहीं जाना चाहते थे, अब तो दीर्घकाल से उन्हीं की सेवा में रहते-रहते ये #बूढ़े हो चले थे | अतः विदुर जी के पूछने से उन्हें अपने प्यारे #प्रभु के चरणकमलों का स्मरण हो आया-उनका चित्त #विरह से व्याकुल हो गया। फिर वे कैसे उत्तर दे सकते थे। उद्धव जी #श्रीकृष्ण के चरणारविन्द-मकरन्द सुधा से सराबोर होकर दो घड़ी तक कुछ भी नहीं बोल सके। तीव्र #भक्तियोग से उसमें डूबकर वे आनन्द-मग्न हो गये। उनके सारे शरीर में रोमांच हो आया तथा मुँदे हुए नेत्रों से प्रेम के #आँसुओं की धारा बहने लगी। उद्धव जी को इस प्रकार प्रेमप्रवाह में डूबे हुए देखकर #विदुर जी ने उन्हें कृतकृत्य माना। कुछ समय बाद जब उद्धव जी भगवान् के प्रेमधाम से उतरकर पुनः धीरे-धीरे संसार में आये, तब अपने नेत्रों को पोंछकर #भगवल्लीलाओं का स्मरण हो आने से विस्मित हो विदुर जी से इस प्रकार कहने लगे।
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भागवत महापुराण द्वितीय स्कंध अध्याय 10 भागवत पुराण के दस विषयों का वर्णन की कथा सुनिए

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #द्वितीय #स्कंध #अध्याय 10 #भागवत #पुराण के #दस #लक्षण #विषयों का #वर्णन की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep pandey 9871030464 https://youtu.be/UiK_E7Pj0XE https://goo.gl/maps/NDYdYv1RBut #श्रीशुकदेव जी कहते हैं- #परीक्षित इस #भागवत #पुराण में #सर्ग, #विसर्ग, #स्थान, #पोषण, #ऊति, #मन्वन्तर, #ईशानुकथा, #निरोध, #मुक्ति और #आश्रय– इन #दस विषयों का #वर्णन है। इसमें जो #दसवाँ #आश्रय-तत्त्व है, उसी का ठीक-ठीक निश्चय करने के लिये कहीं श्रुति से, कहीं #तात्पर्य से और कहीं दोनों के अनुकूल अनुभव से #महात्माओं ने अन्य नौ विषयों का बड़ी सुगम रीति से #वर्णन किया है। #ईश्वर की प्रेरणा से गुणों में क्षोभ होकर रूपान्तर होने से जो आकाशादि #पंचभूत, शब्दादि #तन्मात्राएँ, #इन्द्रियाँ, अहंकार और महत्तत्त्व की उत्पत्ति होती है, उसो #सर्ग कहते हैं। उस विराट् पुरुष से उत्पन्न #ब्रह्मा जी के द्वारा जो विभिन्न चराचर #सृष्टियों का निर्माण होता है, उसका नाम है #विसर्ग। प्रतिपद #नाश की ओर बढ़ने वाली #सृष्टि को एक मर्यादा में स्थिर रखने से भगवान् #विष्णु की जो श्रेष्ठता #सिद्ध होती है, उसका नाम #स्थान है। #श्रीमद्भागवत कथा #द्वितीय स्कन्ध #दशम #अध्याय, #भागवत के दस #लक्षण की #कथा सुनिए #अध्याय #दशम, भागवत के दस विषयों का #वर्णन अध्याय #दशम, #श्रीमद्भागवत #महापुराण संस्कृत #हिंदी pdf, श्रीमद् #भागवत महापुराण #संस्कृत हिंदी, श्रीमद्भागवत #महापुराण #गीता #प्रेस कथा, Importance of #shrimadbhagwat #katha, shri #madbhagwat #mahapuran ki #katha, #श्रीमद्भागवत #महापुराण #द्वितीय स्कन्ध #अध्याय 10 की #कथा, #अध्याय 10 #भागवत के दस #विषयों का #वर्णन, #भागवत के दस #लक्षण की कथा सुनिए

भागवत महापुराण द्वितीय स्कंध अध्याय 9 ब्रह्माजी का भगवद्धाम दर्शन, चतु:श्लोकी भागवत का उपदेश

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#ब्रह्मा जी तपस्वियों में सबसे बड़े #तपस्वी हैं। उनका ज्ञान #अमोघ है। उन्होंने एक समय एक #सहस्र दिव्य वर्ष पर्यन्त एकाग्रचित्त से अपने प्राण, मन, #कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियों को वश में करके ऐसी #तपस्या की, जिससे वे समस्त लोकों को #प्रकाशित करने में समर्थ हो सके। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर #भगवान् ने उन्हें अपना वह लोक दिखाया, जो सबसे श्रेष्ठ है और जिससे परे कोई दूसरा #लोक नहीं है। उस लोक में किसी भी प्रकार के क्लेश, #मोह और भय नहीं हैं। जिन्हें कभी एक बार भी उनके दर्शन का #सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वे #देवता बार-बार उनकी स्तुति करते रहते हैं। वहाँ रजोगुण, #तमोगुण और इनसे मिला हुआ #सत्त्वगुण भी नहीं है। वहाँ न #काल की दाल गलती है और न #माया ही कदम रख सकती है; फिर माया के बाल-बच्चे तो जा ही कैसे सकते हैं। वहाँ भगवान् के वे #पार्षद निवास करते हैं, जिनका पूजन #देवता और #दैत्य दोनों ही करते हैं। उनका उज्ज्वल आभा से युक्त श्याम शरीर शतदल #कमल के समान कोमल नेत्र और पीले रंग के वस्त्र से शोभायमान है। अंग-अंग से राशि-राशि सौन्दर्य बिखरता रहता है। वे कोमलता की #मूर्ति हैं। सभी के चार-चार भुजाएँ हैं। वे स्वयं तो अत्यन्त #तेजस्वी हैं ही, मणिजटित #सुवर्ण के प्रभामय #आभूषण भी धारण किये रहते हैं। उनकी छवि #मूँगे, #वैदूर्यमणि और #कमल के उज्ज्वल #तन्तु के समान हैं।
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भागवत महापुराण द्वितीय स्कन्द अध्याय 7 भगवान के लीला अवतारों की कथा सुनिए

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#ब्रह्मा जी कहते हैं- अनन्त #भगवान् ने प्रलय के जल में डूबी हुई #पृथ्वी का उद्धार करने के लिये समस्त यज्ञमय #वराह शरीर ग्रहण किया था। आदिदैत्य #हिरण्याक्ष जल के अंदर ही लड़ने के लिये उनके सामने आया। जैसे #इन्द्र ने अपने वज्र से पर्वतों के पंख काट डाले थे, वैसे ही वराह #भगवान् ने अपनी दाढ़ों से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। फिर उन्हीं #प्रभु ने रुचि नामक #प्रजापति की पत्नी आकूति के गर्भ से #सुयज्ञ के रूप में ##अवतार ग्रहण किया। उस अवतार में उन्होंने #दक्षिणा नाम की पत्नी से सुयम नाम के #देवताओं को उत्पन्न किया और तीनों #लोकों के बड़े-बड़े संकट हर लिये। इसी से #स्वायम्भुव मनु ने उन्हें ‘#हरि’ के नाम से पुकारा।
#नारद! कर्दम प्रजापति के घर देवहूति के #गर्भ से नौ #बहिनों के साथ भगवान् ने #कपिल के रूप में अवतार ग्रहण किया। उन्होंने अपनी #माता को उस आत्मज्ञान का उपदेश किया, जिससे वे इसी #जन्म में अपने हृदय के सम्पूर्ण मल- तीनों गुणों की #आसक्ति का सारा कीचड़ धोकर ##कपिल भगवान् के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो गयीं। महर्षि #अत्रि भगवान् को पुत्र रूप में प्राप्त करना चाहते थे। उन पर प्रसन्न होकर भगवान् ने उनसे एक दिन कहा कि ‘मैंने अपने-आपको तुम्हें दे दिया।’ इसी से अवतार लेने पर #भगवान् का नाम ‘दत्त’ #दत्तात्रेय पड़ा। उनके चरणकमलों के पराग से अपने शरीर को पवित्र करके राजा #यदु और #सहस्रार्जुन आदि ने योग की, #भोग और #मोक्ष दोनों ही #सिद्धियाँ प्राप्त कीं।
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भागवत महापुराण द्वितीय स्कंध अध्याय 6 विराटस्वरूप की विभूतियों का वर्णन की कथा सुनिए

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#ब्रह्मा जी कहते हैं- उन्हीं #विराट् पुरुष के मुख से वाणी और उसके अधिष्ठातृ #देवता अग्नि उत्पन्न हुए है। सातों छन्द उनकी #सात धातुओं से निकले हैं। #मनुष्यों, #पितरों और #देवताओं के भोजन करने योग्य अमृतमय #अन्न, सब प्रकार के #रस, #रसनेन्द्रिय और उसके अधिष्ठातृ #वरुण विराट् #पुरुष की #चिह्वा से उत्पन्न हुए हैं। उनके नासाछिद्रों से #प्राण, #अपान, #व्यान, #उदान और #समान- ये पाँचों #प्राण और #वायु तथा #घ्राणेन्द्रिय से #अश्विनीकुमार, #समस्त ओषधियाँ एवं साधारण तथा विशेष #गन्ध उत्पन्न हुए हैं। उनकी #नेत्रेन्द्रिय रूप और तेज की तथा #नेत्र-गोलक स्वर्ग और #सूर्य की जन्मभूमि हैं। समस्त #दिशाएँ और पवित्र करने वाले तीर्थ #कानों से तथा #आकाश और शब्द #श्रोत्रेन्द्रिय से निकले हैं। उनका शरीर #संसार की सभी वस्तुओं का #सारभाग तथा सौन्दर्य का खजाना है। सारे #यज्ञ, स्पर्श और वायु उनकी त्वचा से निकले हैं; उनके रोम सभी #उद्भिज्ज पदार्थों का जन्मस्थान हैं, अथवा केवल #उन्हीं के, जिनसे यज्ञ सम्पन्न होते हैं।
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भागवत महापुराण द्वितीय स्कंध अध्याय 5 सृष्टि का वर्णन की कथा सुनिए

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #द्वितीय #स्कंध #अध्याय 5 #सृष्टि का #वर्णन की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep Pandey 9871030464 https://youtu.be/h4CYfsWGlKI https://goo.gl/maps/NDYdYv1RBut
#वेद नारायण के परायण हैं। #देवता भी #नारायण के ही अंगों में #कल्पित हुए हैं और समस्त #यज्ञ भी नारायण की प्रसन्नता के लिये ही हैं तथा उनसे जिन #लोकों की प्राप्ति होती है, वे भी #नारायण में ही कल्पित हैं। सब प्रकार के #योग भी नारायण की प्राप्ति के ही हेतु हैं। सारी #तपस्याएँ नारायण की ओर ही ले जाने वाली हैं, ज्ञान के द्वारा भी #नारायण ही जाने जाते हैं। समस्त #साध्य और साधकों का पर्यवसान #भगवान नारायण ही हैं। वे द्रष्टा होने पर भी #ईश्वर हैं, स्वामी हैं; #निर्विकार होने पर भी सर्वस्वरूप हैं। उन्होंने ही मुझे बनाया है और उनकी दृष्टि से ही प्रेरित होकर मैं उनके इच्छानुसार #सृष्टि-रचना करता हूँ। भगवान #माया के गुणों से रहित एवं अनन्त हैं। #सृष्टि, स्थिति और प्रलय के लिये #रजोगुण, #सत्त्वगुण और #तमोगुण- ये तीन गुण माया के द्वारा उनमें स्वीकार किये गये हैं। ये ही तीनों गुण #द्रव्य, #ज्ञान और क्रिया का #आश्रय लेकर मायातीत #नित्यमुक्त पुरुष को ही #माया में स्थित होने पर #कार्य, #कारण और #कर्तापन के अभिमान से बाँध लेते हैं।
भगवान की #शक्ति से ही #काल ने तीनों गुणों में क्षोभ उत्पन्न कर दिया, स्वभाव ने उन्हें रूपान्ततरित कर दिया और #कर्म ने महत्तत्त्व को जन्म दिया। #रजोगुण और #सत्त्वगुण की वृद्धि होने पर महत्तत्त्व का जो विकार हुआ, उससे ज्ञान, क्रिया और #द्रव्यरूप तमःप्रधान विकार हुआ। वह #अहंकार कहलाया और #विकार को प्राप्त होकर तीन प्रकार का हो गया। उसके भेद हैं- #वैकारिक, #तैजस और #तामस।
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भागवत महापुराण द्वितीय स्कंध अध्याय 2 भगवान के स्थूल और सूक्ष्मरूपो की धारणा की कथा सुनिए

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #द्वितीय #स्कंध #अध्याय 2 #भगवान के #स्थूल और #सूक्ष्मरूपो की धारणा तथा क्रम #मुक्ति और #सद्योमुक्ती का #वर्णन की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep Pandey 9871030464 https://youtu.be/4LIxkFeSKzA https://goo.gl/maps/NDYdYv1RBut
#श्रीशुकदेव जी कहते हैं- #सृष्टि के प्रारम्भ में #ब्रह्मा जी ने इसी धारणा के द्वारा प्रसन्न हुए #भगवान से वह सृष्टि विषयक #स्मृति प्राप्त की थी जो पहले प्रलयकाल में #विलुप्त हो गयी थी। इससे उनकी दृष्टि #अमोघ और बुद्धि निश्चयात्मिका हो गयी, तब उन्होंने इस जगत् को वैसे ही #रचा जैसा कि यह प्रलय के पहले था। #वेदों की वर्णन शैली ही इस प्रकार की है कि लोगों की बुद्धि #स्वर्ग आदि निरर्थक नामों के फेर में फँस जाती है, जीव वहाँ सुख की #वासना में स्वप्न-सा देखता हुआ भटकने लगता है; किंतु उस #मायामय लोकों में कहीं भी उसे सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं होती। इसलिये विद्वान् #पुरुष को चाहिये कि वह #विविध नाम वाले पदार्थों से उतना ही व्यवहार करे, जितना प्रयोजननीय हो। अपनी #बुद्धि को उनकी निस्सारता के निश्चय से परिपूर्ण रखे और एक #क्षण के लिये भी असावधान न हो।
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