भागवत महापुराण द्वितीय स्कंध अध्याय 2 भगवान के स्थूल और सूक्ष्मरूपो की धारणा की कथा सुनिए

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#श्रीशुकदेव जी कहते हैं- #सृष्टि के प्रारम्भ में #ब्रह्मा जी ने इसी धारणा के द्वारा प्रसन्न हुए #भगवान से वह सृष्टि विषयक #स्मृति प्राप्त की थी जो पहले प्रलयकाल में #विलुप्त हो गयी थी। इससे उनकी दृष्टि #अमोघ और बुद्धि निश्चयात्मिका हो गयी, तब उन्होंने इस जगत् को वैसे ही #रचा जैसा कि यह प्रलय के पहले था। #वेदों की वर्णन शैली ही इस प्रकार की है कि लोगों की बुद्धि #स्वर्ग आदि निरर्थक नामों के फेर में फँस जाती है, जीव वहाँ सुख की #वासना में स्वप्न-सा देखता हुआ भटकने लगता है; किंतु उस #मायामय लोकों में कहीं भी उसे सच्चे सुख की प्राप्ति नहीं होती। इसलिये विद्वान् #पुरुष को चाहिये कि वह #विविध नाम वाले पदार्थों से उतना ही व्यवहार करे, जितना प्रयोजननीय हो। अपनी #बुद्धि को उनकी निस्सारता के निश्चय से परिपूर्ण रखे और एक #क्षण के लिये भी असावधान न हो।
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भागवत महापुराण प्रथम स्कंध अध्याय 19 परीक्षित का अनशन व्रत और शुकदेव जी का आगमन की कथा सुनिए

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इस प्रकार #राजा परीक्षित #गंगाजी के तट पर आमरण #अनशन का निश्चय करके उन्होंने समस्त आसक्तियों का #परित्याग कर दिया और वे मुनियों का #व्रत स्वीकार करके अनन्य भाव से #श्रीकृष्ण के चरणकमलों का ध्यान करने लगे। उस समय #त्रिलोकी को पवित्र करने वाले बड़े-बड़े महानुभाव #ऋषि-मुनि अपने शिष्यों के साथ वहाँ पधारे।
जब सब लोग आराम से अपने-अपने आसनों पर बैठ गये, तब महाराज #परीक्षित ने उन्हें फिर से #प्रणाम किया और उनके सामने खड़े होकर शुद्ध हृदय से अंजलि बाँधकर वे जो कुछ करना चाहते थे, उसे सुनाने लगे। राजा #परीक्षित ने कहा- अहो! समस्त #राजाओं में हम #धन्य हैं। #धन्यतम हैं; क्योंकि अपने शील-स्वभाव के कारण हम आप #महापुरुषों के कृपापात्र बन गये हैं। #राजवंश के लोग प्रायः #निन्दित कर्म करने के कारण #ब्राह्मणों के #चरण-धोवन से दूर पड़ जाते हैं- यह कितने #खेद की बात है।
#ब्राह्मणों! अब मैंने अपने चित्त को #भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया है। आप लोग और माँ #गंगाजी शरणागत जानकर मुझ पर अनुग्रह करें, #ब्राह्मण कुमार के शाप से प्रेरित कोई दूसरा कपट से #तक्षक का रूप धरकर मुझे डस ले अथवा स्वयं #तक्षक आकर डस ले; इसकी मुझे तनिक भी परवाह नहीं है। आप लोग कृपा करके #भगवान की रसमयी लीलाओं का गायन करें। मैं आप #ब्राह्मणों के #चरणों में प्रणाम करके पुनः यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे कर्मवश चाहे जिस #योनि में जन्म लेना पड़े, भगवान #श्रीकृष्ण के चरणों में मेरा अनुराग हो, उनके चरणाश्रित #महात्माओं से विशेष प्रीति हो और जगत् के समस्त #प्राणियों के प्रति मेरी एक-सी मैत्री रहे। ऐसा आप #आशीर्वाद दीजिये।
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भागवत महापुराण प्रथम स्कंध अध्याय 18 राजा परीक्षित को श्रृंगी ऋषि का श्राप की कथा सुनिए

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #प्रथम #स्कंध #अध्याय 18 #राजा #परीक्षित को #श्रृंगी #ऋषि का #श्राप की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep Pandey 9871030464 https://youtu.be/hdckHLXrNp8 https://goo.gl/maps/NDYdYv1RBut
एक दिन राजा #परीक्षित धनुष लेकर वन में #शिकार खेलने गये हुए थे। #हरिणों के पीछे दौड़ते-दौड़ते वे थक गये और उन्हें बड़े जोर की भूख और प्यास लगी। जब कहीं उन्हें कोई #जलाशय नहीं मिला, तब वे पास के ही एक ऋषि के #आश्रम में घुस गये। उन्होंने देखा कि वहाँ आँखें बंद करके शान्तभाव से एक #मुनि आसन पर बैठे हुए हैं। जब राजा को वहाँ बैठने के लिये तिनके का आसन भी न मिला, किसी ने उन्हें #भूमि पर भी बैठने को न कहा- अर्घ्य और आदर भरी मीठी बातें तो कहाँ से मिलतीं- तब अपने को #अपमानित-सा मानकर वे क्रोध के वश हो गये। #शौनक जी! वे भूख-प्यास से छटपटा रहे थे, इसलिये एकाएक उन्हें #ब्राह्मण के प्रति ईर्ष्या और क्रोध हो आया। उनके जीवन में इस प्रकार का यह पहला ही अवसर था। वहाँ से लौटते समय उन्होंने #क्रोधवश धनुष की नोक से एक मरा #साँप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और अपनी #राजधानी में चले आये। #ब्रह्मर्षि शमीक ने राजा के शाप की बात सुनकर अपने पुत्र का #अभिनन्दन नहीं किया। उनकी दृष्टि में परीक्षित #शाप के योग्य नहीं थे। उन्होंने कहा- ‘ओह, मूर्ख बालक! तूने बड़ा पाप किया। #खेद है कि उनकी थोड़ी-सी गलती के लिये तूने उनको इतना बड़ा #दण्ड दिया। तेरी बुद्धि अभी कच्ची है। तुझे भगवत्स्वरूप #राजा को साधारण मनुष्यों के समान नहीं समझना चाहिये; क्योंकि राजा के दुस्सह तेज से सुरक्षित और निर्भय रहकर ही #प्रजा अपना कल्याण सम्पादन करती है।
#सूत जी कहते हैं- राजधानी में पहुँचने पर #राजा परीक्षित को अपने उस निन्दनीय कर्म के लिये बड़ा #पश्चाताप हुआ। वे अत्यन्त उदास हो गये और सोचने लगे- मैंने निरपराध एवं तेज छिपाये हुए #ब्राह्मण के साथ अनार्य पुरुषों के समान बड़ा नीच व्यवहार किया। यह बड़े #खेद की बात है। अवश्य ही उन #महात्मा के अपमान के फलस्वरूप शीघ्र-से-शीघ्र मुझ पर कोई घोर #विपत्ति आवेगी। मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ; क्योंकि उससे मेरे #पाप का प्रायश्चित हो जायेगा और फिर कभी मैं ऐसा काम करने का #दुःसाहस नहीं करूँगा। #ब्राह्मणों की क्रोधाग्नि आज ही मेरे #राज्य, #सेना और भरे-पूरे #खजाने को जलाकर #खाक कर दे- जिससे फिर कभी मुझ #दुष्ट की #ब्राह्मण, #देवता और #गौओं के प्रति ऐसी #पाप बुद्धि न हो।
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भागवत महापुराण प्रथम स्कंध अध्याय 17 महाराज परीक्षित द्वारा कलियुग का दमन की कथा सुनिए

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #प्रथम #स्कंध #अध्याय 17 #महाराज #परीक्षित द्वारा #कलियुग का #दमन की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep Pandey 9871030464 https://youtu.be/UcaXeiQ5I0Q https://goo.gl/maps/NDYdYv1RBut महारथी #परीक्षित ने इस प्रकार #धर्म और #पृथ्वी को सान्त्वना दी। फिर उन्होंने #अधर्म के कारणरूप #कलियुग को मारने के लिये तीक्ष्ण #तलवार उठायी। कलियुग ताड़ गया कि ये तो अब मुझे #मार ही डालना चाहते हैं; अतः झटपट उसने अपने #राजचिह्न उतार डाले और भयविह्वल होकर उनके #चरणों में अपना सिर रख दिया। #परीक्षित बड़े #यशस्वी, #दीनवत्सल और #शरणागतरक्षक थे। उन्होंने जब #कलियुग को अपने पैरों पर पड़े देखा तो कृपा करके उसको मारा नहीं, अपितु हँसते हुए-से उससे कहा। परीक्षित बोले- जब तू हाथ जोड़कर शरण में आ गया, तब #अर्जुन के यशस्वी #वंश में उत्पन्न हुए किसी भी वीर से तुझे कोई भय नहीं है। परन्तु तू #अधर्म का सहायक है, इसलिये तुझे मेरे राज्य में बिलकुल नहीं रहना चाहिये। कलियुग ने कहा- #सार्वभौम! आपकी आज्ञा से जहाँ कहीं भी मैं रहने का विचार करता हूँ, वहीं देखता हूँ कि आप #धनुष पर #बाण चढ़ाये खड़े है। #धार्मिकशिरोमणे! आप मुझे वह स्थान बतलाइये, जहाँ मैं आपकी #आज्ञा का पालन करता हुआ स्थिर होकर रह सकूँ। #सूत जी कहते हैं- कलियुग की प्रार्थना स्वीकार करके #राजा परीक्षित ने उसे चार स्थान दिये- #द्यूत, #मद्यपान, #स्त्री-संग और #हिंसा। इन स्थानों में क्रमशः #असत्य, #मद, #आसक्ति और #निर्दयता– ये चार प्रकार के #अधर्म निवास करते हैं। उसने और भी स्थान माँगे। तब समर्थ परीक्षित ने उसे रहने के लिये एक और स्थान- #सुवर्ण (धन) दिया। इस प्रकार कलियुग के #पाँच स्थान हो गये- #झूठ, #मद, #काम, #वैर और #रजोगुण। परीक्षित के दिये हुए इन्हीं #पाँच स्थानों में अधर्म का #मूल कारण कलि उनकी आज्ञाओं का पालन करता हुआ #निवास करने लगा। इसलिये आत्मकल्याणकामी #पुरुष को इन पाँचों #स्थानों का सेवन कभी नहीं करना चाहिये। धार्मिक #राजा, #प्रजा वर्ग के लौकिक नेता और धर्मोपदेष्टा #गुरुओं को तो बड़ी सावधानी से इनका त्याग करना चाहिये। #श्रीमद्भागवत कथा #प्रथम स्कन्ध #सत्रह अध्याय, #महाराज परीक्षित के द्वारा #कलियुग का #दमन #अध्याय सत्रह, #श्रीमद्भागवत महापुराण #संस्कृत हिंदी pdf, श्रीमद् #भागवत महापुराण #संस्कृत हिंदी, श्रीमद्भागवत #महापुराण #गीता #प्रेस कथा, #Importance of #shrimadbhagwat katha, shri #madbhagwat #mahapuran ki #katha , #श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम #स्कन्ध अध्याय #17 की #कथा, #महाराज परीक्षित के द्वारा #कलियुग का #दमन की #कथा #सुनिए अध्याय 17

भागवत महापुराण प्रथम स्कन्द अध्याय 16 परीक्षित की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वी का संवाद की कथा

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #प्रथम #स्कन्द #अध्याय 16 #परीक्षित की #दिग्विजय तथा #धर्म और #पृथ्वी का #संवाद की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep Pandey 9871030464 https://youtu.be/G_20aJ85aa8 https://goo.gl/maps/NDYdYv1RBut #शौनक जी ने पूछा- महाभाग्यवान् #सूत जी! #दिग्विजय के समय महाराज #परीक्षित ने #कलियुग को दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया-मार क्यों नहीं डाला? क्योंकि #राजा का वेष धारण करने पर भी था तो वह अधम #शूद्र ही, जिसने #गाय को लात से मारा था? यदि वह प्रसंग भगवान #श्रीकृष्ण की लीला से अथवा उनके चरणकमलों के मकरन्द-रस का पान करने वाले रसिक #महानुभावों से सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिए। दूसरी #व्यर्थ की बातों से क्या लाभ। उसमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है। #सूत जी ने कहा- जिस समय #राजा परीक्षित #कुरुजांगल देश में #सम्राट् के रूप में निवास कर रहे थे, उस समय उन्होंने सुना कि मेरी #सेना द्वारा सुरक्षित साम्राज्य में #कलियुग का प्रवेश हो गया है। इस समाचार से उन्हें #दुःख तो अवश्य हुआ; परन्तु यह सोचकर कि #युद्ध करने का अवसर हाथ लगा, वे उतने दुःखी नहीं हुए। इसके बाद #युद्धवीर #परीक्षित ने #धनुष हाथ में ले लिया। वे #श्यामवर्ण के घोड़ों से जुते हुए, #सिंह की ध्वजा वाले, सुसज्जित रथ पर सवार होकर #दिग्विजय करने के लिये नगर से बाहर निकल पड़े। उस समय #रथ, #हाथी, #घोड़े और पैदल #सेना उनके साथ-साथ चल रही थी। #श्रीमद्भागवत कथा #प्रथम स्कन्ध #अध्याय #षोडश, #परीक्षित की #दिग्विजय, #धर्म और #पृथ्वी का #संवाद अध्याय #सोलह, #श्रीमद्भागवत #महापुराण संस्कृत #हिंदी pdf, श्रीमद् #भागवत महापुराण #संस्कृत हिंदी, #श्रीमद्भागवत महापुराण #गीता #प्रेस कथा, #Importance of #shrimadbhagwat #katha, shri #madbhagwat #mahapuran ki #katha , #श्रीमद्भागवत #महापुराण प्रथम #स्कन्ध अध्याय #16 की कथा, #परीक्षित की #दिग्विजय, #धर्म और #पृथ्वी का #संवाद अध्याय 16

भागवत महापुराण प्रथम स्कन्द अध्याय 15 पांडवो का परीक्षित को राज्य देकर स्वर्ग सिधारना की कथा

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #प्रथम #स्कन्द #अध्याय 15 #कृष्ण #विरह #व्यथित #पांडवो का #परीक्षित को #राज्य देकर #स्वर्ग #सिधारना की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep Pandey 9871030464 https://youtu.be/tYff_NjP1PI https://goo.gl/maps/NDYdYv1RBut #सूत जी कहते हैं- भगवान के #स्वधामगमन और #यदुवंश के संहार का #वृत्तान्त सुनकर निश्चलमति #युधिष्ठिर ने स्वर्गारोहण का निश्चय किया। #कुन्ती ने भी #अर्जुन के मुख से #यदुवंशियों के नाश और #भगवान के स्वधामगमन की बात सुनकर अनन्य #भक्ति से अपने हृदय को भगवान #श्रीकृष्ण में लगा दिया और सदा के लिये इस जन्म-मृत्युरूप संसार से अपना मुँह मोड़ लिया। भगवान #श्रीकृष्ण ने लोकदृष्टि में जिस #यादव शरीर से पृथ्वी का भार उतारा था, उसका वैसे ही #परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटें से काँटा निकालकर फिर दोनों को फेंक दे। #भगवान की दृष्टि में दोनों ही समान थे। जैसे वे #नट के समान #मत्स्यादि रूप धारण करते हैं और फिर उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादव शरीर से पृथ्वी का भार दूर किया था, उसे #त्याग भी दिया। #युधिष्ठिर ने अपने सब #वस्त्राभूषण आदि वहीं छोड़ दिये एवं ममता और #अहंकार से रहित होकर समस्त #बन्धन काट डाले। इस प्रकार शरीर को #मृत्युरूप अनुभव करके उन्होंने उसे त्रिगुण में मिला दिया, #त्रिगुण को मूल प्रकृति में, सर्वकारणरूपा प्रकृति को आत्मा में और #आत्मा को अविनाशी #ब्रह्म में विलीन कर दिया। भगवान के प्यारे भक्त #पाण्डवों के महाप्रयाण की इस परम पवित्र और मंगलमयी #कथा को जो पुरुष #श्रद्धा से सुनता है, वह निश्चय ही #भगवान की #भक्ति और #मोक्ष प्राप्त करता है। #श्रीमद्भागवत कथा #प्रथम स्कन्ध #अध्याय #पन्द्रह, #कृष्ण #विरह #व्यथित #पाण्डवों का #परीक्षित को, #राज्य देकर #स्वर्ग सिधारना #अध्याय #पन्द्रह, #श्रीमद्भागवत #महापुराण #संस्कृत हिंदी pdf, #श्रीमद् भागवत #महापुराण #संस्कृत #हिंदी, श्रीमद्भागवत #महापुराण #गीता #प्रेस कथा, #Importance of #shrimadbhagwat #katha, shri #madbhagwat #mahapuran ki #katha , #श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम #स्कन्ध #अध्याय 15 की #कथा, कृष्ण #विरह व्यथित #पाण्डवों का #परीक्षित को #राज्य देकर #स्वर्ग सिधारना की कथा

भागवत महापुराण स्कंध एक अध्याय 14 युधिष्ठिर का शंका करना और अर्जुन का द्वारका से लौटने की कथा

#श्रीमद्भागवत #महापुराण #स्कंध #एक #अध्याय 14 #महाराज #युधिष्ठिर का #शंका करना और #अर्जुन का #द्वारका से वापस #लौटने की #कथा #सुनिए by Pandit Pradeep Pandey 9871030464 https://youtu.be/fStsPkcUeXA https://goo.gl/maps/NDYdYv1RBut
#सूत जी कहते हैं- स्वजनों से मिलने के बाद #पुण्यश्लोक भगवान #श्रीकृष्ण अब क्या करना चाहते हैं- यह जानने के लिये #अर्जुन द्वारका गये हुए थे। कई महीने बीत जाने पर भी अर्जुन वहाँ से लौटकर नहीं आये। #धर्मराज युधिष्ठिर को बड़े भयंकर #अपशकुन दीखने लगे। उन्होंने देखा, #काल की गति बड़ी विकट हो गयी है। जिस समय जो #ऋतु होनी चाहिये, उस समय वह नहीं होती और उनकी क्रियाएँ भी #उलटी ही होती हैं। लोग बड़े क्रोधी, लोभी और #असत्य परायण हो गये हैं। अपने #जीवन-निर्वाह के लिये लोग पापपूर्ण #व्यापार करने लगे हैं। सारा व्यवहार #कपट से भरा हुआ होता है, यहाँ तक कि मित्रता में भी छल मिला रहता है; #पिता-माता, सगे-सम्बन्धी, भाई और #पति-पत्नी में भी झगड़ा-टंटा रहने लगा है। #कलिकाल के आ जाने से लोगों का स्वभाव ही लोभ, दम्भ आदि #अधर्म से अभिभूत हो गया है और प्रकृति में भी अत्यन्त #अरिष्टसूचक #अपशकुन होने लगे हैं |
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